गैस उत्पादन में कमी पर सरकार सख्त, केजी-डी6 मामले में रिलायंस-BP पर भारी हर्जाने की तैयारी

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कृष्णा-गोदावरी बेसिन के केजी-डी6 गैस ब्लॉक को लेकर केंद्र सरकार और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड तथा उसकी साझेदार ब्रिटिश पेट्रोलियम (BP) के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। सरकार ने गैस उत्पादन के तय लक्ष्यों को पूरा न करने का आरोप लगाते हुए रिलायंस-BP से 30 अरब डॉलर से अधिक के मुआवजे की मांग का रुख अपनाया है। यह विवाद भारत के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े सबसे बड़े और जटिल मामलों में गिना जाता है, जिसका असर निवेश, नीति और भविष्य की ऊर्जा रणनीति पर भी पड़ सकता है।

सरकार का कहना है कि केजी-डी6 ब्लॉक के धीरूभाई-1 और धीरूभाई-3 गैस क्षेत्रों के लिए जिन उत्पादन अनुमानों और विकास योजनाओं को मंजूरी दी गई थी, उनका पूरी तरह पालन नहीं किया गया। आरोप है कि अपेक्षित निवेश और तकनीकी उपाय समय पर नहीं अपनाए गए, जिससे गैस उत्पादन अनुमानों से काफी कम रहा। शुरुआती वर्षों में उत्पादन में तेजी आई, लेकिन बाद में इसमें तेज गिरावट देखी गई और अंततः फरवरी 2020 में इन क्षेत्रों को उनके अनुमानित जीवनकाल से पहले ही बंद करना पड़ा। सरकार के अनुसार इससे देश को गैस आपूर्ति में नुकसान हुआ और आयात पर निर्भरता बढ़ी।

केंद्र सरकार का तर्क है कि उत्पादन लक्ष्य चूकने से न केवल राजस्व का नुकसान हुआ, बल्कि वैकल्पिक ईंधन की ऊंची लागत, ब्याज और अन्य आर्थिक नुकसान भी झेलने पड़े। इसी आधार पर सरकार ने मध्यस्थता न्यायाधिकरण में 30 अरब डॉलर से अधिक के मुआवजे का दावा रखा है। यह मामला तीन-सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पैनल के समक्ष लंबित है, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क और साक्ष्य पेश कर चुके हैं। अंतिम फैसला आने में अभी कुछ समय लग सकता है।

वहीं, रिलायंस इंडस्ट्रीज और बीपी ने सरकार के दावों को खारिज किया है। रिलायंस का कहना है कि 30 अरब डॉलर के मुआवजे से जुड़ी मीडिया रिपोर्टें तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक हैं। कंपनी के अनुसार सरकार का वास्तविक दावा इससे कहीं कम राशि का है, जिसका उल्लेख वह पहले ही अपने वित्तीय दस्तावेजों में कर चुकी है। रिलायंस-BP का यह भी तर्क है कि गैस उत्पादन में गिरावट भूगर्भीय कारणों और प्राकृतिक चुनौतियों की वजह से हुई, न कि किसी जानबूझकर की गई लापरवाही के कारण।

यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि केजी-डी6 ब्लॉक भारत की घरेलू गैस उत्पादन क्षमता का प्रमुख स्रोत रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला भविष्य में तेल-गैस क्षेत्रों के लिए अनुबंध शर्तों, निवेशकों के भरोसे और सरकार-निजी कंपनियों के संबंधों को नई दिशा दे सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसले पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में भारत की ऊर्जा नीति और निवेश माहौल पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

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