दुनिया में मंदी की आहट, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था ने दिखाई मजबूती

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वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय मंदी के दबाव, भू-राजनीतिक तनाव, बढ़ते ब्याज दरों और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटों जैसी चुनौतियों से गुजर रही है, लेकिन इन सभी उतार-चढ़ावों के बीच भारत की अर्थव्यवस्था ने असाधारण मजबूती और स्थिरता का परिचय दिया है। अमेरिका और यूरोप में आर्थिक सुस्ती, वैश्विक व्यापार पर बढ़ते टैरिफ और अनिश्चित अंतरराष्ट्रीय माहौल के बावजूद भारत का विकास पथ प्रभावित नहीं हुआ है। मजबूत घरेलू मांग, नीति-आधारित सुधारों और स्थिर वित्तीय प्रणाली ने भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक झटकों से काफी हद तक सुरक्षित रखा है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), OECD और अन्य वैश्विक संस्थाओं के अनुमानों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर लगभग 6.6 से 6.7 प्रतिशत रहने की संभावना है, जो विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक मानी जा रही है। वैश्विक संगठनों का मानना है कि नियंत्रित मुद्रास्फीति, मजबूत उपभोक्ता खर्च और निरंतर निवेश प्रवाह ने भारत की विकास गति को बनाए रखा है। यह भी कहा गया है कि भारत की आर्थिक संरचना अब पहले से कहीं अधिक लचीली और संकट-रोधी बन चुकी है।

सरकार द्वारा लागू किए गए संरचनात्मक सुधारों का सकारात्मक असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। वस्तु एवं सेवा कर (GST) में सुधार, व्यापार सुगमता बढ़ाने वाले कदम, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों ने उत्पादन और निर्यात को प्रोत्साहन दिया है। इन नीतिगत उपायों से न केवल उद्योगों को बल मिला है, बल्कि रोजगार सृजन और निवेशक विश्वास में भी वृद्धि हुई है। इसके साथ ही मौद्रिक नीति के संतुलित रुख ने महंगाई को नियंत्रण में रखते हुए आर्थिक गतिविधियों को गति दी है।

औद्योगिक क्षेत्र की बात करें तो हालिया आंकड़े भारत की आर्थिक मजबूती को और पुख्ता करते हैं। विनिर्माण और निर्माण गतिविधियों में तेजी आई है और औद्योगिक उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा और बुनियादी ढांचा जैसे क्षेत्रों ने इस विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके समानांतर बैंकिंग सेक्टर भी पहले की तुलना में कहीं अधिक सशक्त हुआ है। गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) में कमी और मजबूत बैलेंस शीट ने वित्तीय प्रणाली पर जनता और निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है।

भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू उपभोक्ता बाजार है। वैश्विक एजेंसियों के अनुसार, घरेलू मांग और सेवाक्षेत्र ने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंदी और व्यापारिक अनिश्चितताओं से काफी हद तक सुरक्षित रखा है। बढ़ती आय, शहरीकरण, डिजिटल लेनदेन और सेवाओं के विस्तार ने उपभोग को निरंतर समर्थन दिया है, जिससे आर्थिक विकास को स्थिर आधार मिला है।

कुल मिलाकर, भारत की अर्थव्यवस्था ने यह साबित कर दिया है कि सुधार-उन्मुख नीतियां, मजबूत वित्तीय ढांचा और व्यापक घरेलू बाजार किसी भी वैश्विक संकट का सामना करने में सक्षम हैं। वैश्विक उथल-पुथल के इस दौर में भारत न केवल स्थिर बना हुआ है, बल्कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह और मजबूत कर रहा है। आने वाले वर्षों में निरंतर सुधार, निवेश और नवाचार भारत को दीर्घकालिक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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