वैश्विक आर्थिक दबावों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था पर विकास जोखिम बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में हालिया विश्लेषणात्मक रिपोर्टों में दावा किया गया है कि यदि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर भारत की विकास गति पर पड़ता है, तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ब्याज दरों में एक और कटौती करने का कदम उठा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वभर में मंदी की आशंका, व्यापारिक तनाव, विदेशी पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में धीमी बढ़त जैसे कारक भारतीय नीति-निर्माताओं को विशेष रूप से सतर्क कर रहे हैं।
दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में RBI पहले ही रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट घटाकर 5.25% पर ला चुका है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने तरलता सुधारने के लिए ओपन मार्केट ऑपरेशन्स के तहत बड़े पैमाने पर सरकारी बॉन्ड खरीदने और रुपये की स्थिरता के लिए डॉलर-रुपया स्वैप की व्यवस्था करने का भी निर्णय लिया था। इन कदमों का उद्देश्य बाजार में नकदी उपलब्धता बढ़ाना और विदेशी मुद्रा बाजार में संभावित उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना था। विशेषज्ञों के अनुसार, यह संकेत है कि RBI मौद्रिक नीति को विकास-सहायक रखने के पक्ष में है, बशर्ते महंगाई नियंत्रण में बनी रहे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की वर्तमान आर्थिक बुनियाद मजबूत है—GDP वृद्धि अनुमान 7% से अधिक, घरेलू मांग स्थिर और महंगाई दर लक्ष्य सीमा से नीचे। हालांकि, वैश्विक जोखिम बढ़ते हैं तो घरेलू उत्पादन, निर्यात और निवेश प्रभावित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में RBI के सामने ब्याज दरों में और कटौती का रास्ता खुल सकता है, ताकि बाजार में उधारी की लागत घटे और आर्थिक गतिविधियों को अतिरिक्त समर्थन मिल सके। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वित्तीय वर्ष के शेष समय में यदि बाहरी दबाव गहराते हैं, तो मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) विकास की रक्षा के लिए नरम रुख अपना सकती है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आगे किसी भी कटौती का फैसला दो प्रमुख संकेतकों पर निर्भर करेगा—महंगाई की स्थिरता और वैश्विक आर्थिक स्वास्थ्य। यदि अंतरराष्ट्रीय हालात और बिगड़े, तो भारतीय बाजारों में निवेश माहौल नरम पड़ सकता है, जिससे RBI को अपने कदमों में लचीलापन लाने की आवश्यकता पड़ेगी। वहीं, आम उपभोक्ताओं के लिए संभावित दर कटौती का मतलब होगा कि गृह ऋण, वाहन ऋण और अन्य उधार की EMI में कमी आ सकती है, जबकि उद्योग जगत के लिए यह उत्पादन लागत कम करने और निवेश बढ़ाने का अवसर प्रदान करेगा।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति स्थिर दिख रही है, लेकिन वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताएँ भविष्य की मौद्रिक नीति को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में बाज़ार की निगाहें आने वाले तिमाहियों पर टिकी हैं, जहाँ RBI का अगला निर्णय भारत की विकास गति और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय हालात—दोनों पर आधारित होगा।













