लोकसभा में आज राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम पर विशेष चर्चा हो रही है, जो इसके 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित की गई है। संसद की कार्यसूची में इसे एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में शामिल किया गया है और इसके लिए पूरे दस घंटे का समय निर्धारित किया गया है। इस चर्चा की शुरुआत स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे, जिससे यह संकेत मिलता है कि सरकार इस विमर्श को केवल औपचारिकता नहीं बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद के रूप में देख रही है।
संसद में यह बहस दोपहर 12 बजे शुरू होने की योजना है। स्पीकर और संसदीय टीम ने दिन का पूरा समय इस विषय के लिए सुरक्षित रखा है, ताकि सदन के सभी पक्ष अपने विचारों को विस्तार से रख सकें। इस चर्चा में वंदे मातरम के ऐतिहासिक महत्व, सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रवादी भावनाओं तथा इससे जुड़े संवैधानिक पहलुओं पर गहन विमर्श किया जाएगा। सरकार का मानना है कि यह गीत सिर्फ एक सांस्कृतिक धरोहर नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणास्रोत भी रहा है।
हालाँकि, यह चर्चा पूरी तरह सरल रहने के आसार कम हैं। राजनीतिक गलियारों में पहले से ही इस विषय को लेकर तीखी बयानबाज़ी देखी जा चुकी है। विपक्ष और सरकार के बीच वंदे मातरम के कुछ हिस्सों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं, और हाल के दिनों में दोनों ओर से आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हुए हैं। इसलिए आज सदन में बहस के दौरान माहौल के गरमाने की संभावना है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे सत्र का सबसे विवादास्पद और भावनात्मक मुद्दा भी मान रहे हैं।
बहस में भाग लेने वालों की सूची भी चर्चा का विषय बनी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी के अलावा सरकार के वरिष्ठ मंत्री इसमें हिस्सा लेंगे। उधर विपक्ष की ओर से कांग्रेस, तृणमूल, डीएमके और अन्य दलों के कई प्रमुख चेहरे अपनी बात रखेंगे। कांग्रेस की ओर से गौरव गोगोई और प्रियंका गांधी के शामिल होने की संभावना है, जिससे बहस और भी राजनीतिक रंग ले सकती है।
इसी के समानांतर, राज्यसभा में भी इस विषय पर चर्चा की तैयारी की खबरें हैं। वहां भी यह विषय केवल सांस्कृतिक विमर्श तक सीमित न रहकर राजनीतिक टकराव का कारण बन सकता है। सरकार की ओर से गृह मंत्री अमित शाह इस विषय पर अपनी बात रख सकते हैं, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा बताकर सवाल खड़े कर सकता है।
वंदे मातरम की पृष्ठभूमि भी इस बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित यह गीत स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान देशभक्ति की प्रेरणा बना। हालांकि समय-समय पर इसके कुछ हिस्सों को लेकर विवाद भी उभरे हैं। आज की चर्चा का उद्देश्य इसे नए परिप्रेक्ष्य में समझने, इसके ऐतिहासिक महत्व को फिर से स्मरण कराने और राष्ट्रीय पहचान में इसके योगदान को सामने रखने का है।
लोकसभा में आज की बहस का परिणाम यह तय करेगा कि यह विमर्श एक सकारात्मक सांस्कृतिक संवाद में बदलता है या राजनीतिक तकरार इसका स्वरूप बदल देती है। सभी की नज़र इस पर रहेगी कि प्रधानमंत्री का संबोधन इस बहस को किस दिशा में ले जाता है और विपक्ष किस प्रकार इसका जवाब देता है। चर्चा के बाद आगे किसी प्रस्ताव या सर्वसम्मत संकल्प की संभावना भी जताई जा रही है।













