पुतिन यात्रा के बीच भारत का कड़ा संदेश—हमारी विदेश नीति पर बाहरी दबाव नहीं चलेगा

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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दो दिवसीय भारत यात्रा ने दोनों देशों के बीच मजबूत रणनीतिक साझेदारी को एक बार फिर रेखांकित किया है। 4–5 दिसंबर 2025 के इस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच व्यापक और गहन वार्ताएँ हुईं, जिनमें ऊर्जा आपूर्ति, द्विपक्षीय व्यापार, रक्षा सहयोग, परमाणु प्रौद्योगिकी और उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में साझेदारी को और गहरा करने पर महत्वपूर्ण सहमति बनी। भारत और रूस ने वर्ष 2030 तक आपसी व्यापार को लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य दोहराया, जबकि पुतिन ने यह सुनिश्चित करने का आश्वासन दिया कि रूस से भारत को ऊर्जा, विशेषकर कच्चे तेल की आपूर्ति, बिना किसी बाधा के लगातार जारी रहेगी। यह आश्वासन ऐसे समय में आया जब अमेरिका और पश्चिमी देशों की ओर से रूस-भारत ऊर्जा व्यापार पर असंतोष और दबाव की खबरें लगातार सामने आ रही थीं।

इसी पृष्ठभूमि में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर का बयान बेहद निर्णायक माना जा रहा है। जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत-रूस संबंधों पर किसी भी तीसरे देश का वीटो लागू नहीं होता और भारत अपनी विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र रूप से तय करता है। उनका यह बयान अमेरिका की कथित नाराज़गी और पश्चिमी आपत्तियों के बीच एक सख्त और स्पष्ट संदेश माना गया है कि नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर साझेदार चुनती है और किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेगी। विदेश मंत्री ने यह भी दोहराया कि भारत का वैश्विक दृष्टिकोण बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में है, जहाँ भारत पश्चिम, रूस और अन्य देशों — सभी के साथ संतुलित, स्वायत्त और स्थिर संबंध बनाए रखेगा।

पुतिन की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ाने के लिए रोडमैप तैयार किया गया। ऊर्जा सुरक्षा को लेकर हुई चर्चाओं में दीर्घकालिक सप्लाई समझौतों, गैस परियोजनाओं और परमाणु ऊर्जा सहयोग को विस्तार देने के प्रस्ताव शामिल थे। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन, स्पेयर पार्ट्स सप्लाई और संयुक्त विनिर्माण से संबंधित मुद्दों पर भी ठोस प्रगति हुई। दोनों नेताओं की उपस्थिति में हुई बैठकों में कृषि, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष सहयोग, डिजिटल भुगतान प्रणालियों और अन्य उभरते क्षेत्रों में भी समन्वय बढ़ाने पर सहमति बनी। पुतिन के दौरे में सांस्कृतिक और शैक्षणिक आदान-प्रदान से जुड़े कार्यक्रमों पर भी ज़ोर दिया गया, ताकि दोनों देशों के समाजों के बीच संपर्क और समझ मजबूत हो सके।

विदेश मंत्री जयशंकर ने राष्ट्रपति पुतिन को विदाई देते हुए इस यात्रा को ‘स्मरणीय’ बताया, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में दोनों देशों की नीतियों और सहयोग को आकार देगा। विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा न केवल भारत और रूस के ऐतिहासिक संबंधों को नए आयाम देता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि भारत वैश्विक राजनीति में अपने हितों के अनुसार ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के सिद्धांत पर दृढ़ता से आगे बढ़ रहा है। अमेरिका की नाराज़गी और पश्चिमी दबावों के बीच भारत की यह स्थिति एक स्पष्ट संकेत है कि नई दिल्ली किसी भी आलोचना या दबाव के बावजूद रूस के साथ अपने दीर्घकालिक, भरोसेमंद और व्यवहारिक संबंधों को बनाए रखेगी। यह यात्रा बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में भारत की नीति और स्वतंत्र कूटनीति का एक सशक्त उदाहरण मानी जा रही है।

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