भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव को लेकर चीन द्वारा मध्यस्थता का दावा किए जाने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। चीन ने यह दावा किया है कि उसने मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़े सैन्य तनाव को कम कराने में अहम भूमिका निभाई और दोनों देशों के बीच सुलह की दिशा में पहल की। चीन के विदेश मंत्री वांग यी के इस बयान को बीजिंग ने अपनी कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश किया है, लेकिन भारत ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
भारत सरकार का स्पष्ट रुख है कि भारत-पाकिस्तान के बीच हुए संघर्षविराम में किसी भी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं रही। सरकारी सूत्रों के अनुसार, तनाव के बाद बातचीत सीधे दोनों देशों के सैन्य और कूटनीतिक चैनलों के जरिए हुई थी। भारत का यह भी कहना है कि पाकिस्तान की ओर से संघर्षविराम का अनुरोध किया गया था, जिसे भारत ने अपने शर्तों पर स्वीकार किया। सरकार ने दोहराया कि भारत अपने द्विपक्षीय मामलों में किसी बाहरी मध्यस्थता को न तो स्वीकार करता है और न ही उसकी जरूरत मानता है।
इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि चीन का इस तरह का दावा राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा गंभीर विषय है, जिस पर प्रधानमंत्री को चुप्पी तोड़कर देश को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। कांग्रेस का आरोप है कि इससे पहले भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तीसरे पक्ष द्वारा भारत-पाकिस्तान मुद्दे में मध्यस्थता के दावे किए गए, लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से कोई सख्त और सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि चीन और पाकिस्तान के बीच पहले से ही करीबी रिश्ते हैं और ऐसे में चीन द्वारा भारत-पाक तनाव में मध्यस्थता का दावा करना भारत की कूटनीतिक स्थिति को कमजोर दिखाने की कोशिश हो सकती है। पार्टी ने यह भी कहा कि सीमा विवाद, व्यापार घाटे और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चीन के साथ भारत के संबंध पहले ही संवेदनशील हैं, ऐसे में इस तरह के बयान को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
राजनीतिक और कूटनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर भारत की विदेश नीति और दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन की छवि पर भी पड़ता है। भारत का दो टूक संदेश रहा है कि कश्मीर या भारत-पाकिस्तान से जुड़े किसी भी मुद्दे पर केवल द्विपक्षीय बातचीत ही रास्ता है। ऐसे में चीन के मध्यस्थता दावे को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच जारी यह बहस आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना













