केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर चिंता जताते हुए कहा है कि आज के दौर में टैरिफ का इस्तेमाल एक आर्थिक औज़ार नहीं बल्कि “हथियार” के रूप में किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कई देश अपने रणनीतिक और राजनीतिक हितों को साधने के लिए आयात-निर्यात शुल्क और नॉन-टैरिफ बाधाओं का सहारा ले रहे हैं, जिससे मुक्त, निष्पक्ष और नियम-आधारित वैश्विक व्यापार प्रणाली कमजोर हो रही है। वित्त मंत्री के अनुसार यह प्रवृत्ति वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और विकासशील देशों की आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बनती जा रही है।
निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में व्यापार केवल आर्थिक गतिविधि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भू-राजनीति से गहराई से जुड़ गया है। टैरिफ बढ़ाने, आयात पर प्रतिबंध लगाने और तकनीकी व पर्यावरणीय मानकों के नाम पर व्यापार अवरोध खड़े करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ता है जो निर्यात पर निर्भर हैं या जिनकी अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजारों से जुड़ी हुई है।
वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत ने अपने घरेलू उद्योगों और किसानों के हितों की रक्षा के लिए संतुलित और जरूरत-आधारित नीतियां अपनाई हैं। उन्होंने कहा कि भारत का दृष्टिकोण संरक्षणवाद का नहीं है, बल्कि प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती हासिल करने का है। भारत वैश्विक व्यापार में भरोसेमंद भागीदार बना रहना चाहता है और इसके लिए वह नियमों पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था का समर्थन करता है।
सीतारमण के अनुसार, बदलते वैश्विक हालात में भारत को अपनी रणनीति और कूटनीति दोनों को मजबूत करना होगा। निर्यातकों को नए बाजारों से जोड़ना, मुक्त व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाना और घरेलू विनिर्माण क्षमता को सशक्त करना समय की जरूरत है। उन्होंने भरोसा जताया कि संरचनात्मक सुधारों, निवेश और नवाचार के बल पर भारत इन चुनौतियों का सामना करते हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका और मजबूत करेगा।













