महाराष्ट्र के कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के एक बयान ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पुणे में मीडिया से बातचीत के दौरान चव्हाण ने भारतीय थलसेना की संख्या को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि वर्तमान समय में भारत के पास लगभग 12 लाख से अधिक सैनिक हैं और यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्या भविष्य के युद्धों के लिए इतनी बड़ी जमीनी सेना की जरूरत बनी रहेगी। उनका कहना था कि बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में युद्ध की प्रकृति भी तेजी से बदल रही है।
पृथ्वीराज चव्हाण ने अपने बयान में यह तर्क दिया कि आने वाले समय में युद्ध मुख्य रूप से हवाई, मिसाइल और तकनीकी क्षमताओं पर आधारित होंगे। उन्होंने कहा कि हाल के सैन्य अभियानों में भी यह देखा गया है कि निर्णायक भूमिका वायुसेना और मिसाइल सिस्टम की रही है, जबकि बड़े पैमाने पर आमने-सामने के जमीनी युद्ध कम होते जा रहे हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने सेना की संरचना और संसाधनों के पुनर्मूल्यांकन की बात कही।
चव्हाण ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका बयान सेना के सम्मान या उसके शौर्य पर सवाल उठाने के उद्देश्य से नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा नीति पर एक गंभीर विमर्श का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा को मजबूत बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक, खुफिया तंत्र और रणनीतिक क्षमता को और सुदृढ़ करने की जरूरत है, ताकि बदलती चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।
हालांकि, उनके इस बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो गई। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे बयान सशस्त्र बलों के मनोबल को प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा बार-बार सेना से जुड़े मुद्दों पर इस तरह के सवाल उठाना अनुचित है और इससे देश की सुरक्षा को लेकर गलत संदेश जाता है।
दूसरी ओर, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पृथ्वीराज चव्हाण का बयान एक व्यापक नीति बहस की ओर इशारा करता है, जिसमें यह चर्चा जरूरी है कि भारत को भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए किस तरह की सैन्य रणनीति और संसाधन संरचना अपनानी चाहिए। यह मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और दीर्घकालिक रणनीतिक सोच से भी जुड़ा हुआ है।













