कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने संसद में एक संवेदनशील और विवादास्पद विषय को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाने का कदम उठाया है—उन्होंने लोकसभा में एक निजी विधेयक पेश कर वैवाहिक दुष्कर्म (marital rape) को अपराध की श्रेणी में शामिल करने की माँग की है। थरूर ने स्पष्ट रूप से कहा कि विवाह किसी भी तरह से किसी व्यक्ति की स्वीकृति या शारीरिक स्वायत्तता को समाप्त नहीं कर सकता और न ही यह किसी को यह अधिकार देता है कि वह अनचाहे, जबरन या दबाव में लाकर यौन संबंध स्थापित करे। उनका तर्क है कि सहमति का सिद्धांत सार्वभौमिक होना चाहिए और “ना का मतलब सिर्फ ना” से आगे बढ़कर “केवल हाँ का मतलब हाँ” जैसे स्पष्ट मानकों को कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए, ताकि विवाहित महिलाओं को भी वैसा ही संरक्षण प्राप्त हो सके जैसा अन्य सभी व्यक्तियों को मिलता है।
थरूर ने सदन में अपने प्रस्ताव के दौरान कहा कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था में कई खामियाँ ऐसी हैं जो पीड़ित महिलाओं को न्याय तक पहुँचने से रोकती हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय दण्ड संहिता में रेप की परिभाषा में विवाह के भीतर होने वाले यौन संबंध को मौहालतन अपवाद माना गया है, जिससे विवाहित महिलाओं के लिये आपराधिक संरक्षण सीमित रह जाता है। थरूर के मुताबिक यह स्थिति न केवल संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है, बल्कि मानवाधिकारों और व्यक्तिगत गरिमा के सिद्धांतों के भी खिलाफ है। इसलिए आवश्यक है कि संसद इस विषय पर खुलकर चर्चा करे और वैधानिक सुधार करके महिलाओं की सुरक्षा को सुदृढ़ करे।
इस निजी विधेयक का उद्देश्य सिर्फ कानूनी परिभाषा बदलना नहीं है, बल्कि समाज में सहमति-आधारित नज़रिया स्थापित करना भी है। थरूर ने कहा कि जब किसी भी व्यक्ति की सहमति ही अंतिम मानक होगी तो विवाह जैसे रिश्ते में भी पारस्परिक सम्मान और समझ को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि वैधानिक मान्यता मिलने से पीड़ितों के लिए मदद के रास्ते खुलेंगे, सामाजिक कलंक और शर्म को कम करने में मदद मिलेगी और वैवाहिक हिंसा के खिलाफ चेतना बढ़ेगी। इसी संदर्भ में थरूर ने कहा कि यह मुद्दा न्यायिक या संवैधानिक प्रक्रिया का मामला होने के साथ-साथ एक सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन की भी आवश्यकता दर्शाता है।
थरूर ने इस मुख्य विधेयक के साथ दो अन्य निजी विधेयकों — ‘राइट टू डिसकनेक्ट’ (कर्मचारी को कार्य के बाद फोन और संदेशों से अलग रहने का अधिकार) और राज्य पुनर्गठन कमीशन के प्रस्ताव — को भी सदन में पेश किया। उनके मुताबिक ये पहलें समग्र रूप से व्यक्तिगत अधिकारों, कार्य-जीवन संतुलन और सामाजिक न्याय से जुड़ी हैं। उन्होंने अपेक्षा जताई कि इन प्रस्तावों पर गंभीर और तथ्य-आधारित बहस होगी, ताकि कानून और नीतियों में सुधार करके आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।
राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में ऐसे प्राइवेट मेंबर बिल अक्सर गहन बहस को जन्म देते हैं—क्योंकि यह सिर्फ कानून निर्माताओं का मसला नहीं रहता, बल्कि सामाजिक मान्यताओं, सांस्कृतिक संवेदनाओं और निजी जीवन के दायरे पर भी चर्चा छिड़ जाती है। थरूर के प्रवर्तित प्रस्ताव ने महिलाओं के अधिकारों के समर्थकों, विधिवेताओं और नागरिक समाज के कई वर्गों में समर्थन और सवाल दोनों उठाए हैं—एक ओर जहां कई लोग इसे आवश्यक और साहसिक कदम बता रहे हैं, वहीं कुछ आलोचक इसे पारिवारिक संस्थाओं में दखलअंदाजी मान सकते हैं। परंतु थरूर का कहना है कि किसी भी विवाद के बावजूद यदि लाखों महिलाओं को न्याय और सुरक्षा हासिल होती है तो यह कदम लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचायक होगा।
अब अगला चरण यह है कि इस निजी विधेयक पर सदन में कितनी गंभीरता से बहस होगी, क्या सरकार इसे समर्थन देगी या किसी व्यापक विधायी प्रक्रिया की मांग करेगी, और क्या यह किसी संसदीय समिति या व्यापक सार्वजनिक परामर्श की दिशा में जाएगा। थरूर ने सुझाव दिया है कि अगर यह विषय पारदर्शी ढंग से, विशेषज्ञों और पीड़ितों की आवाज के साथ उठाया जाए तो एक संतुलित और न्यायसंगत समाधान निकाला जा सकता है। इस प्रस्ताव ने देशभर में सहमति, निजता और वैवाहिक अधिकारों पर एक नई, आवश्यक बहस शुरू कर दी है—जिसका प्रभाव सिर्फ कानून नहीं बल्कि समाज के मूल्यों और व्यवहारों पर भी दीर्घकालिक होगा।













