EV की मांग धीमी, दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल कारों की वापसी तेज़

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दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर बढ़ता असमंजस अब उपभोक्ता व्यवहार में स्पष्ट दिखाई देने लगा है। कई वैश्विक बाजारों में कार खरीदार दोबारा पेट्रोल और डीजल जैसे पारंपरिक इंजन वाले वाहनों की ओर लौटने लगे हैं। पेशेवर परामर्श कंपनी EY की हालिया रिपोर्ट बताती है कि ईवी को लेकर उपभोक्ताओं का भरोसा पहले की तुलना में कम हुआ है और अब लगभग आधे खरीदार अगले दो वर्षों में नया या सेकंड हैंड ICE वाहन खरीदने पर विचार कर रहे हैं। बदलती सरकारी नीतियाँ, वैश्विक तनाव, महंगी बैटरी तकनीक, चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर की धीमी रफ्तार और ईवी के वास्तविक उपयोग में सामने आने वाली चुनौतियाँ इस बदलाव के प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। कई देशों में ईवी को अनिवार्य करने की दिशा में बने लक्ष्यों में संशोधन या समय-सीमा बढ़ाने जैसे संकेतों ने भी उपभोक्ताओं को यह संदेश दिया है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर तेज़ी से होने वाला संक्रमण अब उतनी गति से नहीं बढ़ रहा जितना पहले अनुमान था।

ग्राहकों के मन में बढ़ती चार्जिंग-एंग्जाइटी, लंबे सफर की असुविधा और उच्च प्रारंभिक लागत ने हाइब्रिड वाहनों को एक मजबूत विकल्प के रूप में उभारा है। भारत में हालिया उपभोक्ता सर्वेक्षणों में त्योहारी सीज़न के दौरान हाइब्रिड कारों की मांग पेट्रोल और इलेक्ट्रिक वाहनों दोनों से अधिक देखने को मिली है, जो यह दर्शाता है कि भारतीय बाज़ार में भी ईवी को पूर्ण रूप से अपनाने से पहले लोग मध्यवर्ती समाधान तलाश रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि कई ईवी मालिक चार्जिंग की दिक्कतों, सर्विस-मुद्दों और पुनर्विक्रय मूल्य की अनिश्चितता के कारण वापसी करते हुए पारंपरिक या हाइब्रिड मॉडल खरीदने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। चीन और यूरोप जैसे बड़े बाजारों में भी ईवी की बिक्री महीनों के अनुसार उतार-चढ़ाव में चल रही है, जबकि पारंपरिक और हाइब्रिड वाहनों ने कई मौकों पर बेहतर प्रदर्शन किया है।

इस बदलते माहौल ने ऑटोमोबाइल उद्योग को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है। वाहन निर्माता कंपनियों को अब अपनी उत्पादन रणनीतियों, निवेश योजनाओं और तकनीकी प्राथमिकताओं पर दोबारा विचार करना पड़ रहा है। चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार धीमा होने और बैटरी से जुड़ी लागतों में तेजी से कमी न आने के कारण कंपनियों को हाइब्रिड समेत विविध विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करना पड़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि ईवी अपनाने की धीमी गति वैश्विक कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को प्रभावित कर सकती है, खासकर तब जब कई देशों ने अपनी मूल नीतियों में नरमी ला दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रवृत्ति स्थायी नहीं भी हो सकती, लेकिन यह संकेत अवश्य देती है कि उपभोक्ताओं की प्राथमिकताओं में तेजी से बदलाव आ रहा है और ईवी बाजार को स्थायी गति देने के लिए सरकारों और उद्योगों को संयुक्त रूप से लागत, नीति और इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चों पर मजबूत कदम उठाने होंगे। यदि चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार तेज़ हो, लागत कम हो और स्पष्ट नीतियाँ लागू हों, तो इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग एक बार फिर से ताक़त पकड़ सकती है।

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