सुप्रीम कोर्ट में जलवायु और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर आगामी सोमवार को सुनवाई होने जा रही है। यह याचिका उनकी पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो ने दायर की है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि उनके पति को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जिस तरह से हिरासत में रखा गया है, वह अनुचित, असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि वांगचुक की गिरफ्तारी ऐसे आधारों पर की गई है जो या तो पुराने हैं या पर्याप्त साक्ष्यों पर आधारित नहीं हैं। परिवार का कहना है कि उन्हें हिरासत के ठोस कारण या उससे जुड़े दस्तावेज भी प्रदान नहीं किए गए, जिससे न्यायिक समीक्षा मुश्किल हो रही है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से वांगचुक की तत्काल रिहाई की मांग करते हुए यह आरोप लगाया है कि उनके पति के खिलाफ NSA का इस्तेमाल किसी राजनीतिक प्रतिशोध या शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और लद्दाख प्रशासन से विस्तृत जवाब तलब किया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि हिरासत किन परिस्थितियों और प्रमाणों के आधार पर की गई है। अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि अगले चरण की सुनवाई में सरकार को सभी दस्तावेज और रिकॉर्ड प्रस्तुत करने होंगे, जिससे हिरासत के कानूनी आधार की गहन जांच की जा सके।
ज्ञात रहे कि लेह क्षेत्र में हाल ही में हुए विरोध-प्रदर्शनों और कथित हिंसक घटनाओं के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने वांगचुक को हिरासत में लिया था। प्रशासन ने आरोप लगाया था कि उनकी गतिविधियाँ क्षेत्र में तनाव बढ़ा सकती हैं, जबकि समर्थकों और नागरिक-अधिकार समूहों ने इसे शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति पर हमला बताया है। इसी बीच, वांगचुक के वकीलों ने दलील दी है कि इस कार्रवाई से न केवल मौलिक स्वतंत्रता प्रभावित हुई है, बल्कि प्रशासन पारदर्शिता और विधि प्रक्रिया का भी पालन नहीं कर रहा है।
अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि इसमें यह तय होगा कि वांगचुक की वर्तमान हिरासत संवैधानिक जांच की कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं। अदालत के सामने दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड्स की विस्तृत समीक्षा की जाएगी, जिसके बाद ही आगे के आदेश जारी किए जाएंगे। इस मामले पर देशभर के कई सामाजिक संगठनों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और नागरिक-समूहों की नज़रें बनी हुई हैं, क्योंकि यह मामला न केवल व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़ा है बल्कि यह भी तय करेगा कि सुरक्षा कानूनों का उपयोग किन परिस्थितियों में और कैसे किया जाना चाहिए।













