दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के चुनावों को चुनौती देने वाली ओलंपियन पहलवानों बजरंग पुनिया, विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और सत्यवर्त काडियन की याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने सोमवार को अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा सुनवाई के दौरान लगातार अनुपस्थित रहने और मामले को आगे न बढ़ाने के कारण याचिका को डिफॉल्ट और नॉन-प्रॉसिक्यूशन के आधार पर रद्द किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया के लिए पक्षकारों की उपस्थिति और उनके द्वारा प्रस्तुत तर्क अत्यंत आवश्यक हैं, और जब याचिकाकर्ता स्वयं ही इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हो रहे, तो मामले को आगे सुनना संभव नहीं है।
यह मामला दिसंबर 2023 में हुए WFI चुनावों से जुड़ा था, जिसमें संजय सिंह ने अनिता शेरोन को हराकर अध्यक्ष पद का पदभार प्राप्त किया था। अनिता शेरोन को ही बजरंग पुनिया और उनके साथियों का समर्थन प्राप्त था, जबकि पहलवानों का आरोप था कि चुनाव की प्रक्रिया कई स्तरों पर त्रुटिपूर्ण और पक्षपाती थी। याचिका में दावा किया गया था कि चुनाव निष्पक्ष वातावरण में नहीं हुए और नियमों का पालन नहीं किया गया, इसलिए अदालत को हस्तक्षेप कर चुनाव को निरस्त करना चाहिए। लेकिन अदालत में सुनवाई के दौरान इन दावों को ठोस रूप से आगे नहीं बढ़ाया जा सका।
हाईकोर्ट के इस फैसले को पहलवानों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि यह विवाद पिछले दो वर्षों से भारतीय कुश्ती जगत में बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बना हुआ था। याचिका खारिज होने के बाद अब WFI के वर्तमान पदाधिकारियों पर कोई तत्काल कानूनी बाधा नहीं रहेगी और उनका कार्यकाल यथावत जारी रहेगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि याचिकाकर्ता चाहे तो भविष्य में किसी नयी याचिका या अपील के माध्यम से फिर से कानूनी रास्ता अपना सकते हैं, लेकिन मौजूदा आदेश के बाद अदालत ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि बिना पर्याप्त उपस्थिति और तर्कों के अदालत किसी विवाद को अनिश्चितकाल तक खुला नहीं रख सकती।
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में पहलवानों का वह बड़ा आंदोलन भी शामिल है, जिसमें उन्होंने WFI की पूर्व कार्य प्रणाली, नेतृत्व और चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए थे। कई महीनों की खींचतान के बाद खेल मंत्रालय ने हस्तक्षेप कर फेडरेशन को निलंबित किया था और फिर नए चुनावों की राह बनाई थी। चुनाव के बाद भी विवाद शांत नहीं हुआ और मामला अदालत पहुंच गया। हालांकि अब हाईकोर्ट के निर्णय ने फिलहाल इस विवाद पर कानूनी रूप से विराम लगा दिया है। आगे पहलवान क्या रणनीति अपनाते हैं और क्या वे दोबारा कानूनी विकल्प तलाशेंगे, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।













