कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह के हालिया बयान ने एक बार फिर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की संगठनात्मक क्षमता की खुले तौर पर प्रशंसा करते हुए कांग्रेस संगठन की कमजोरियों को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि वह आरएसएस की विचारधारा से सहमत नहीं हैं, लेकिन संगठन के तौर पर उसकी कार्यप्रणाली और अनुशासन से इनकार नहीं किया जा सकता। उनके इस बयान को कांग्रेस के भीतर आत्ममंथन की जरूरत के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक पुरानी तस्वीर साझा की, जिसमें वे वरिष्ठ नेताओं के चरणों के पास बैठे नजर आ रहे हैं। इस तस्वीर के जरिए दिग्विजय सिंह ने यह बताने की कोशिश की कि कैसे एक मजबूत संगठन अपने कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर से शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने का अवसर देता है। उन्होंने इसे संगठन की ताकत का उदाहरण बताया और कहा कि यही कारण है कि आरएसएस लंबे समय तक प्रभावी बना हुआ है।
हालांकि, दिग्विजय सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी यह टिप्पणी आरएसएस या भाजपा की नीतियों का समर्थन नहीं है। उन्होंने कहा कि वह आज भी संघ और मौजूदा सरकार की विचारधारा के घोर विरोधी हैं, लेकिन किसी संगठन की क्षमता की प्रशंसा करना और उसकी विचारधारा से सहमत होना दो अलग बातें हैं। उनका कहना था कि राजनीतिक दलों को विरोध करते हुए भी दूसरों से सीखने की जरूरत होती है।
इस दौरान दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने स्वीकार किया कि कांग्रेस एक आंदोलन खड़ा करने में सक्षम है, लेकिन उस आंदोलन को चुनावी सफलता में बदलने में पार्टी बार-बार चूक जाती है। उनके अनुसार, कांग्रेस को जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने और विकेंद्रीकृत नेतृत्व विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि पार्टी जनता से बेहतर तरीके से जुड़ सके।
दिग्विजय सिंह के बयान पर सियासी प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। भाजपा नेताओं ने इसे कांग्रेस की आंतरिक कमजोरी और नेतृत्व संकट का प्रमाण बताया, जबकि कांग्रेस के भीतर इसे लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ नेताओं ने इसे रचनात्मक आलोचना मानते हुए आत्ममंथन की जरूरत बताई, तो कुछ ने समय और शब्दों के चयन पर सवाल उठाए।
कुल मिलाकर, दिग्विजय सिंह का यह बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस संगठनात्मक पुनर्गठन और रणनीति पर मंथन कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान कांग्रेस के भीतर संगठन की मजबूती और कार्यप्रणाली को लेकर चल रही बहस को और तेज कर सकता है, जिसका असर आने वाले राजनीतिक फैसलों पर भी पड़ सकता है।













