सीएम स्टालिन ने केंद्र पर उठाए सवाल, कहा- भाजपा सामाजिक विविधता को कमजोर कर रही है

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने भाजपा पर एक बार फिर तीखे आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) की अवधारणा से नफरत करती है और इसे भारत के संविधान से हटाने के लिए उत्सुक है। स्टालिन ने यह बयान तिरुनेलवेली में आयोजित क्रिसमस समारोह के दौरान दिया, जहां उन्होंने संविधान की प्रस्तावना और उसके मूल्यों की रक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।

सीएम ने कहा कि भाजपा के लिए सेक्युलर शब्द ऐसा है जैसे नीम का कड़वा फल, जिसे पार्टी संविधान से हटाना चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा देश की विविधता और सामाजिक सामंजस्य को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता राज्य की सबसे बड़ी ताकत है और इसे कोई भी राजनीतिक दल तोड़ नहीं सकता।

कार्यक्रम के दौरान स्टालिन ने 19वीं शताब्दी की ईसाई मिशनरी सारा टकर के महिलाओं के शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्य की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि विभिन्न धार्मिक समुदायों को एक साथ मिलकर रहना चाहिए और उनकी सरकार बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों के लोगों के लिए काम कर रही है। स्टालिन ने केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि वह अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ नीतियां अपनाकर सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर रही है।

राजनीतिक दृष्टि से स्टालिन ने अपने बयान में केंद्र के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ अपनी पुरानी स्थिति दोहराई और कहा कि भाजपा की नीतियां देश की सामाजिक संरचना को नुकसान पहुंचा सकती हैं। हालांकि भाजपा की तरफ से इस आरोप पर अभी तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन तमिलनाडु में केंद्र और राज्य सरकार के बीच राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहा है।

विश्लेषकों के अनुसार, स्टालिन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देशभर में संविधान की प्रस्तावना से “धर्मनिरपेक्ष” शब्द को हटाने को लेकर बहस तेज है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि संविधान की प्रस्तावना से सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्द हटाए नहीं जा सकते। इस पूरे घटनाक्रम ने तमिलनाडु में सियासी गरमाहट बढ़ा दी है और संघ–राज्य के बीच मतभेदों को गहरा कर दिया है।

स्टालिन के इस बयान ने न केवल राज्य में राजनीतिक हलचल पैदा की है, बल्कि देशभर में धर्मनिरपेक्षता और संविधान के मूल्यों को लेकर चर्चा को भी बढ़ावा दिया है। उनके बयान ने यह संकेत दिया कि आगामी विधानसभा चुनावों में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक समानता जैसे मुद्दे मुख्य रूप से सियासी बहस का हिस्सा रहेंगे।

Leave a Comment

और पढ़ें