विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक राजनीति में हो रहे बदलावों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि दुनिया के शक्ति संतुलन में बड़ा परिवर्तन आ चुका है और अब कोई भी देश अपनी मर्जी दूसरों पर थोपने की स्थिति में नहीं है। उन्होंने यह बात पुणे में एक शैक्षणिक कार्यक्रम के दौरान कही, जहाँ उन्होंने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और भारत की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। जयशंकर के अनुसार, पिछली कुछ दशकों में वैश्विक व्यवस्था एकध्रुवीय रही, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय स्वरूप की ओर बढ़ रही है।
विदेश मंत्री ने कहा कि आज की वैश्विक राजनीति में शक्ति केवल सैन्य बल तक सीमित नहीं रह गई है। अब अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी क्षमता, आपूर्ति श्रृंखला, नवाचार और मानव संसाधन भी शक्ति के अहम घटक बन चुके हैं। इन्हीं कारणों से वैश्विक शक्ति का केंद्रीकरण टूट रहा है और कई देश अपनी-अपनी क्षमताओं के आधार पर अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बदले हुए परिदृश्य में किसी एक देश के लिए सभी मुद्दों पर अपनी शर्तें मनवाना संभव नहीं है।
डॉ. जयशंकर ने यह भी कहा कि दुनिया आज स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा के दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों साथ-साथ चलते हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि वैश्विक समस्याओं का समाधान अब दबाव, धमकी या टकराव से नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए संवाद, कूटनीति और आपसी समझ जरूरी है। जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य, आतंकवाद, आपूर्ति श्रृंखला संकट और आर्थिक अस्थिरता जैसे मुद्दों पर देशों को मिलकर काम करना होगा।
अपने संबोधन में विदेश मंत्री ने भारत की विदेश नीति का भी उल्लेख किया और कहा कि भारत बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप एक संतुलित और व्यावहारिक नीति अपना रहा है। भारत न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा है, बल्कि वैश्विक शांति, स्थिरता और समावेशी विकास में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत का दृष्टिकोण किसी एक गुट के साथ खड़े होने के बजाय सभी के साथ संवाद और सहयोग पर आधारित है।
राजनीतिक और कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जयशंकर का यह बयान भारत की उभरती वैश्विक भूमिका को रेखांकित करता है। उनका कहना है कि आने वाले वर्षों में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और मजबूत होगी, जिसमें उभरती अर्थव्यवस्थाएं और विकासशील देश भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे। कुल मिलाकर, विदेश मंत्री का यह बयान इस बात का संकेत है कि वैश्विक शक्ति संतुलन अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है, जहाँ सहयोग, साझेदारी और आपसी सम्मान ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय करेंगे।













