प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस आदानोम घेब्रेयेसस से मुलाकात की, जिसमें वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों, पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर व्यापक चर्चा हुई। यह मुलाकात दूसरे WHO ग्लोबल समिट ऑन ट्रेडिशनल मेडिसिन के अवसर पर हुई, जहाँ दुनिया भर से आए स्वास्थ्य विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों ने भाग लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की भूमिका को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाने पर केंद्रित रहा।
WHO प्रमुख डॉ. टेड्रोस ने भारत की सराहना करते हुए कहा कि भारत ने पूरी दुनिया को यह उदाहरण दिया है कि परंपरा और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि आयुष, योग और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़कर भारत ने एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है, जो न केवल प्रभावी है बल्कि सुलभ और किफायती भी है। उनके अनुसार, पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ाने और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर कहा कि भारत समग्र स्वास्थ्य और वेलनेस की अवधारणा में विश्वास करता है, जहाँ इलाज के साथ-साथ रोगों की रोकथाम पर भी जोर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ सदियों पुराने अनुभव और ज्ञान पर आधारित हैं, जिन्हें आधुनिक शोध और वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप विकसित किया जा रहा है। पीएम मोदी ने वैश्विक सहयोग, शोध और नवाचार के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा को सुरक्षित और प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
इस मुलाकात और समिट के दौरान यह भी सहमति बनी कि पारंपरिक चिकित्सा की गुणवत्ता, सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा मानक तैयार किए जाएँ। साथ ही, डिजिटल तकनीक, डेटा साझा करने और वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से इन पद्धतियों को आधुनिक स्वास्थ्य प्रणालियों से जोड़ा जाए। WHO प्रमुख ने कहा कि भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था समावेशी और साक्ष्य-आधारित होनी चाहिए, जिसमें परंपरा और विज्ञान दोनों की अहम भूमिका हो।
कुल मिलाकर, पीएम मोदी और WHO प्रमुख की यह मुलाकात वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है। यह संदेश भी स्पष्ट हुआ कि आने वाले समय में दुनिया को एक ऐसे स्वास्थ्य मॉडल की जरूरत है, जिसमें आधुनिक विज्ञान के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान को भी समान महत्व दिया जाए, ताकि स्वस्थ समाज और बेहतर जीवन की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।













