पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक-राजनीतिक चर्चा को फिर तेज कर दिया है। राजन के अनुसार भारत पर लगे लगभग 50% अमेरिकी टैरिफ का संबंध केवल व्यापारिक या तेल आयात जैसे आर्थिक कारणों से नहीं था, बल्कि इसके पीछे उस समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ और कूटनीतिक संकेत अधिक प्रभावशाली रहे। उनका कहना है कि भारत द्वारा रूस से ऊर्जा खरीद को इस निर्णय का मुख्य कारण बताना सही नहीं है, बल्कि अमेरिका ने इसे एक व्यापक राजनीतिक संदेश के तौर पर इस्तेमाल किया।
राजन ने अपने भाषण में यह भी कहा कि पाकिस्तान ने उस समय अमेरिका के नेतृत्व को जिस तरह से समर्थनपूर्ण प्रतिक्रिया दी, उसने उसके लिए माहौल तुलनात्मक रूप से सहज बनाया। उन्होंने उदाहरण दिया कि जब अमेरिकी नेतृत्व ने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने में अपनी भूमिका का दावा किया, तो पाकिस्तान ने इस दावे को मान्यता दी, जबकि भारत ने इसका स्पष्ट खंडन किया। राजन के अनुसार इस कूटनीतिक अंतर ने अमेरिका की नीतिगत प्रतिक्रिया को प्रभावित किया, जिसके चलते पाकिस्तान पर कम और भारत पर अधिक सख्त आर्थिक शर्तें लागू होती दिखाई दीं।
राजन की टिप्पणी के सामने आने के बाद आर्थिक विशेषज्ञों और सोशल मीडिया में व्यापक बहस शुरू हो गई। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला स्पष्ट करता है कि वैश्विक व्यापार नीति केवल आर्थिक गणना का विषय नहीं होती, बल्कि राजनीतिक रिश्तों और नेताओं के व्यक्तिगत समीकरणों का भी उस पर गहरा प्रभाव पड़ता है। दूसरी ओर भारत ने अपनी नीति को संतुलित बताते हुए कहा है कि वह अपनी ऊर्जा और आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है और टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। राजन के बयान ने एक बार फिर यह प्रश्न उठाया है कि बड़े देशों की व्यापारिक रणनीतियाँ किस हद तक कूटनीति और व्यक्तिगत राजनीतिक संदेशों पर निर्भर हो सकती हैं।













