दिमाग पर कीटनाशकों का हमला! आईसीएमआर ने मांगा राष्ट्रीय निगरानी कार्यक्रम

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भारत में किसानों और खेतों में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए कीटनाशकों का लगातार संपर्क अब केवल शारीरिक स्वास्थ्य का जोखिम नहीं रहा, बल्कि मानसिक और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य पर भी इसका गंभीर असर सामने आ रहा है। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों और आईसीएमआर से जुड़े निष्कर्षों ने यह चेतावनी दी है कि कृषि क्षेत्रों में उपयोग किए जाने वाले कई रसायन, विशेष रूप से ऑर्गेनोफॉस्फेट और अन्य न्यूरोटॉक्सिक कीटनाशक, अवसाद (डिप्रेशन), चिंता, चिड़चिड़ापन और याददाश्त कमजोर होने जैसी समस्याओं को बढ़ा रहे हैं। लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोगों में यह प्रभाव और भी गंभीर रूप से देखा गया है, जिससे उनके दैनिक जीवन, कामकाज और सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ता है।

अध्ययनों में पाया गया है कि जो किसान या मजदूर बिना उचित सुरक्षा उपकरणों के छिड़काव करते हैं, लगातार खेतों में काम करते हैं या रसायनों के संपर्क में अधिक समय बिताते हैं, उनमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। कुछ शोधों में अवसाद और मेमोरी-लॉस के मामलों में स्पष्ट वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि कई कीटनाशकों का प्रभाव दिमाग के न्यूरो-केमिकल सिस्टम पर पड़ता है, जिससे न्यूरोट्रांसमीटर का संतुलन बिगड़ सकता है। यही कारण है कि शरीर में एसीटाइल-कोलिनेस्ट्रेज़ स्तर में बदलाव देखे जाते हैं, जो न्यूरोटॉक्सिक असर की पुष्टि करते हैं। यह प्रभाव धीरे-धीरे मानसिक थकान, ध्यान में कमी, भूलने की बीमारी, और व्यवहार में परिवर्तन के रूप में बढ़ता जाता है।

खास तौर पर प्रभावित होने वाले समूहों में वे किसान, खेत मजदूर और पेस्टीसाइड एप्लिकेटर शामिल हैं जो लगातार कृषि रसायनों के संपर्क में रहते हैं और सुरक्षा उपायों का पालन करने में सक्षम नहीं होते। कई बार जागरूकता की कमी, आर्थिक सीमाएँ या प्रशिक्षण का अभाव उन्हें सुरक्षित उपाय अपनाने से रोक देता है। बुजुर्ग किसानों में यह प्रभाव और भी गहरा देखा गया है क्योंकि उम्र के साथ दिमाग की संरचना और न्यूरोलॉजिकल सिस्टम अधिक संवेदनशील हो जाता है। इसके अलावा महिलाएँ और बच्चे, खासकर वे जो कृषि क्षेत्रों में रहते हैं, अप्रत्यक्ष संपर्क के चलते भी जोखिम में आते हैं।

आईसीएमआर से जुड़े विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने इस बढ़ते खतरे को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक निगरानी (National Monitoring Programme) की मांग की है। उनका कहना है कि देश को ऐसा तंत्र चाहिए जो कृषि क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की नियमित जांच कर सके, कीटनाशक एक्सपोज़र से जुड़े बायोमार्कर को मॉनिटर कर सके, और प्रभावित समुदायों तक समय रहते सहायता पहुंचा सके। साथ ही, रसायनों के सुरक्षित उपयोग, PPE किट के वितरण और Integrated Pest Management जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने की भी जरूरत बताई गई है ताकि रसायनों पर निर्भरता कम हो और किसानों का स्वास्थ्य सुरक्षित रखा जा सके।

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि हालाँकि उपलब्ध अध्ययन मजबूत संकेत दे रहे हैं, लेकिन अभी भी कारण-प्रभाव संबंध को पूरी तरह समझने के लिए बड़े और लंबे समय तक चलने वाले शोध की आवश्यकता है। इसलिए सरकार, नीति-निर्माताओं, स्वास्थ्य संस्थानों और कृषि विभाग को मिलकर एक ऐसी रणनीति अपनानी चाहिए, जो वैज्ञानिक अनुसंधान, स्वास्थ्य सेवाओं और किसानों की सुरक्षा—तीनों को एकजुट कर सके। समय रहते आवश्यक कदम उठाए गए तो किसानों की मानसिक और संज्ञानात्मक सेहत पर बढ़ते इस जोखिम को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

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