भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देशभर में श्रद्धा और गर्व का माहौल है। यह गीत न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा है, बल्कि मातृभूमि के प्रति समर्पण और सम्मान की भावना का प्रतीक भी है। वंदे मातरम की रचना 7 नवंबर 1875 को महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। उन्होंने इसे सबसे पहले बंगाली साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित किया था। उस समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह कविता आने वाले समय में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणा-स्रोत बनेगी।
बंकिम चंद्र ने वंदे मातरम को संस्कृत-प्रभावित बंगला भाषा में लिखा। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ (1882) में शामिल किया गया। उपन्यास के प्रकाशन के साथ ही यह गीत व्यापक रूप से लोगों तक पहुँचा और भारत की आज़ादी की लड़ाई में एक राष्ट्रीय नारा बन गया। 1896 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे संगीतबद्ध कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया। इसके बाद यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के लिए जोश और एकता का प्रतीक बन गया। क्रांतिकारी आंदोलनों से लेकर जनसभाओं तक, वंदे मातरम की गूंज पूरे भारत में सुनाई देने लगी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने वंदे मातरम के पहले दो छंदों को भारत का राष्ट्रीय गीत (National Song) घोषित किया। इसे ‘जन गण मन’ की तरह ही सम्मान देने का निर्णय लिया गया। हालांकि इसके कुछ बाद के छंदों को लेकर समय-समय पर धार्मिक प्रतीकों के संदर्भ में विवाद भी उठे, लेकिन इसके बावजूद यह गीत भारतीय एकता और राष्ट्रीय गौरव का अटूट प्रतीक बना रहा।
साल 2025 में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर केंद्र सरकार ने इस ऐतिहासिक अवसर को राष्ट्रीय स्मरणोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए वंदे मातरम की स्मृति में स्मारक डाक टिकट और ₹150 का स्मारक सिक्का जारी किया। इस अवसर पर पूरे देश में सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनी, सार्वजनिक गायन और ऐतिहासिक दस्तावेजों की प्रदर्शनी आयोजित की जा रही है। गृह मंत्री अमित शाह ने इस अवसर पर कहा कि वंदे मातरम आज भी भारतीयों में राष्ट्रभक्ति की अमर ज्वाला जगाता है।
150 वर्षों के इस गौरवशाली सफर में वंदे मातरम ने साहित्य, संगीत और राष्ट्रीय भावना — तीनों को एक सूत्र में पिरोया है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के आत्मसम्मान और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना का अमर प्रतीक है। आज जब देश इस गीत के डेढ़ सदी पूरे होने का जश्न मना रहा है, तब यह याद दिलाना आवश्यक है कि शब्दों से परे भी कुछ ऐसी भावनाएँ होती हैं जो पीढ़ियों को जोड़ती हैं — और वंदे मातरम उन्हीं में से एक है।













