पंजाब की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस में संभावित वापसी की चर्चाओं ने प्रदेश कांग्रेस को दो साफ-साफ खेमों में बांट दिया है। यह मुद्दा केवल एक नेता की वापसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे पार्टी की भविष्य की दिशा, नेतृत्व और रणनीति पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
कांग्रेस के एक धड़े का मानना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह की वापसी पार्टी के लिए संजीवनी साबित हो सकती है। यह गुट, जिसे राजनीतिक गलियारों में “माझा एक्सप्रेस” के नाम से जाना जा रहा है, कैप्टन के लंबे प्रशासनिक अनुभव और उनके प्रभावशाली जनाधार को पार्टी के लिए फायदेमंद बता रहा है। इस खेमे का तर्क है कि कैप्टन आज भी खासकर माझा क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखते हैं और उनकी वापसी से कांग्रेस को खोया हुआ पारंपरिक वोट बैंक वापस मिल सकता है। कई वरिष्ठ नेता खुलकर या परोक्ष रूप से उनके समर्थन में नजर आ रहे हैं और इसे पार्टी को फिर से मजबूत करने का मौका बता रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की नई पीढ़ी और युवा नेता इस वापसी के सख्त खिलाफ दिखाई दे रहे हैं। उनका कहना है कि कैप्टन के नेतृत्व में ही कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था, ऐसे में पुराने चेहरों पर फिर से दांव लगाना पार्टी को पीछे ले जा सकता है। यह वर्ग बदलाव, नए नेतृत्व और नई सोच की वकालत कर रहा है। उनका मानना है कि पार्टी को अब युवाओं को आगे बढ़ाना चाहिए ताकि जनता के बीच एक नया और सकारात्मक संदेश जा सके।
इन दोनों खेमों की खींचतान ने कांग्रेस हाईकमान की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। नेतृत्व के सामने यह बड़ा सवाल है कि अनुभव और पुराने जनाधार को प्राथमिकता दी जाए या संगठन में पीढ़ीगत बदलाव को आगे बढ़ाया जाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कैप्टन की वापसी से जहां कुछ क्षेत्रों में कांग्रेस को फायदा हो सकता है, वहीं इससे अंदरूनी गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष और गहराने का खतरा भी है।
कुल मिलाकर, कैप्टन अमरिंदर सिंह की संभावित वापसी ने पंजाब कांग्रेस में एक नए राजनीतिक घमासान को जन्म दे दिया है। एक ओर स्वागत के लिए तैयार नेता हैं तो दूसरी ओर विरोध में खड़ी नई पीढ़ी। आने वाले समय में कांग्रेस हाईकमान का फैसला न केवल पंजाब की राजनीति बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय भविष्य के लिए भी बेहद अहम साबित हो सकता है।













