पर्यावरण बनाम नीति: अरावली की नई परिभाषा पर केंद्र और कांग्रेस आमने-सामने

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नई दिल्ली: अरावली पर्वतमाला को लेकर देश में एक बार फिर बड़ा पर्यावरणीय और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि अरावली की नई परिभाषा से इस प्राचीन पर्वतमाला का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नई कानूनी परिभाषा के चलते अरावली के बड़े हिस्से को पर्यावरणीय और कानूनी संरक्षण से बाहर किया जा सकता है, जिससे खनन और अनियंत्रित निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।

जयराम रमेश ने कहा कि नई परिभाषा के तहत केवल वही पहाड़ियां अरावली मानी जाएंगी, जिनकी ऊंचाई स्थानीय जमीन से कम से कम 100 मीटर हो और जिनके दो या अधिक हिल्स 500 मीटर की दूरी में स्थित हों। कांग्रेस का दावा है कि इस मानक को लागू करने से अरावली का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षित दायरे से बाहर हो जाएगा, क्योंकि अधिकांश पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंचाई की हैं, लेकिन पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद अहम भूमिका निभाती हैं।

कांग्रेस का कहना है कि अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। यह थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकने, भूजल स्तर बनाए रखने, वायु प्रदूषण और धूल को नियंत्रित करने तथा जैव विविधता को संरक्षण देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पार्टी का आरोप है कि नई परिभाषा से इन प्राकृतिक सेवाओं को भारी नुकसान पहुंच सकता है और इससे आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय संकट गहराने की आशंका है।

कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया है कि परिभाषा में बदलाव से रियल एस्टेट और खनन लॉबी को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर इस फैसले पर सवाल उठाए और इसे पारदर्शिता के बिना लिया गया कदम बताया। उनका कहना है कि सरकार को पर्यावरण विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों से परामर्श किए बिना ऐसा बदलाव नहीं करना चाहिए।

इस मुद्दे पर राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली समेत कई राज्यों में विरोध-प्रदर्शन भी देखने को मिले हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर नई परिभाषा लागू हुई तो छोटे-छोटे पहाड़ी क्षेत्र खनन और अवैध निर्माण के लिए खुल जाएंगे, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति हो सकती है।

वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि अरावली की नई परिभाषा वैज्ञानिक आधार पर तय की गई है और इसका उद्देश्य नियमों को स्पष्ट करना तथा अवैध गतिविधियों पर बेहतर नियंत्रण स्थापित करना है। सरकार का दावा है कि इससे संरक्षण व्यवस्था मजबूत होगी, न कि कमजोर। हालांकि विपक्ष और पर्यावरण विशेषज्ञ इस तर्क से सहमत नहीं हैं।

फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है और आने वाली सुनवाई को बेहद अहम माना जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन को लेकर यह विवाद अब न्यायिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है।

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