संसद सत्र से पहले मोदी का बड़ा बयान, कांग्रेस ने बताया पाखंड—“असल मुद्दों से बच रही सरकार”

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संसद के शीतकालीन सत्र से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान—“यहाँ ड्रामा नहीं, डिलीवरी होनी चाहिए”—ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पीएम मोदी ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि संसद देश की प्रगति और निर्णयों के लिए है, न कि अनावश्यक हंगामे या राजनीतिक प्रदर्शन के लिए। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए यह भी कहा कि चुनावी हार या राजनीतिक असफलताओं के बाद कई दल संसद को “ड्रामा मंच” की तरह इस्तेमाल करते हैं। प्रधानमंत्री का यह बयान सत्र की शुरुआत से पहले राजनीतिक माहौल को गर्म कर गया और विपक्ष ने इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी।

कांग्रेस ने इस बयान को तुरंत आड़े हाथों लेते हुए प्रधानमंत्री पर पलटवार किया। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोदी को “सबसे बड़े ड्रामेबाज़” तक कह डाला। खड़गे का आरोप था कि सरकार असल मुद्दों से बचने के लिए ऐसे बयान देती है और जनता को प्रभावित करने वाले विषयों—जैसे महंगाई, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, प्रदूषण और अर्थव्यवस्था—पर चर्चा से बचती रही है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहस और प्रश्न पूछना ड्रामा नहीं, बल्कि संसद की आत्मा है।

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी प्रधानमंत्री के “ड्रामा” वाले बयान को लेकर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि जनता के मुद्दों पर बोलना और उन्हें संसद में उठाना “नाटक” नहीं, बल्कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों का दायित्व है। प्रियंका गांधी ने तंज कसते हुए कहा कि अगर प्रदूषण, महंगाई और युवाओं की नौकरी की समस्या पर चर्चा करना ड्रामा है, तो फिर सरकार किसे “समस्या” मानेगी? उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार कठिन सवालों से बचने के लिए विपक्षी आवाज़ों को दबाती रही है।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री पर पाखंड का आरोप लगाते हुए कहा कि संसद में बहस और लंबी चर्चा को रोकने वाले वास्तव में खुद सरकार के कदम होते हैं। उनके अनुसार, कई महत्वपूर्ण विधेयकों को जल्दबाज़ी में बिना पर्याप्त बहस के पारित किया गया है। विपक्ष ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में बहस, असहमति और सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन सरकार बार-बार इन्हें “हंगामा” या “ड्रामा” बताकर संसद की वास्तविक भूमिका को कमजोर कर रही है।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर संसद की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक संवाद की आवश्यकता पर बड़ी बहस को जन्म दिया है। जहां सरकार का तर्क है कि संसद में “काम” होना चाहिए और विपक्षी हंगामे से विकास बाधित होता है, वहीं विपक्ष का कहना है कि “काम” केवल बिल पारित करना नहीं, बल्कि संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बहस करना भी है। असल मुद्दों से दूर जाने या उन्हें चर्चा योग्य न मानने की नीति लोकतंत्र और पारदर्शिता दोनों के लिए चुनौती पैदा करती है।

शीतकालीन सत्र की शुरुआत से पहले उठा यह विवाद बताता है कि आने वाले दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और गहराने की संभावना है। यह भी साफ है कि संसद केवल “डिलीवरी” का मंच नहीं, बल्कि संवाद, जांच, समीक्षा और उत्तरदायित्व का सबसे बड़ा संस्थान है—और इसी पर राजनीतिक संघर्ष अब और तीखा होता दिख रहा है।

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