बीएमसी चुनाव में बढ़ा सियासी तापमान, ठाकरे बंधुओं की एकजुटता से बदले संकेत

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बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) चुनाव से पहले महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) अध्यक्ष राज ठाकरे ने एक साझा मंच से सत्ताधारी गठबंधन पर तीखा हमला बोला। दोनों ठाकरे बंधुओं ने आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था लोकतंत्र की भावना के खिलाफ काम कर रही है और इसे ‘लोकतंत्र नहीं बल्कि झुंडशाही’ करार दिया। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिशें की जा रही हैं, जिससे निष्पक्ष चुनाव पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

उद्धव ठाकरे ने आरोप लगाया कि कई जगहों पर विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोका गया या दबाव में नाम वापस लेने को मजबूर किया गया, जिसके चलते कई सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध चुने जा रहे हैं। उन्होंने इसे चुनावी धांधली का गंभीर मामला बताया और कहा कि यह केवल वोटों की चोरी नहीं बल्कि उम्मीदवारों की भी ‘चोरी’ है। ठाकरे ने चुनाव आयोग और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए मांग की कि संबंधित अधिकारियों की निष्पक्षता की जांच होनी चाहिए।

राज ठाकरे ने भी सत्ताधारी दलों पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अगर चुनाव निष्पक्ष नहीं होंगे तो जनता का भरोसा व्यवस्था से उठ जाएगा। राज ठाकरे ने स्पष्ट किया कि मुंबई जैसे महानगर में पारदर्शी प्रशासन और ईमानदार चुनाव बेहद जरूरी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बीएमसी जैसे अहम स्थानीय निकाय के चुनाव में किसी भी तरह की गड़बड़ी को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

दोनों नेताओं ने बीएमसी चुनाव के लिए साझा घोषणापत्र, जिसे ‘वचननामा’ नाम दिया गया है, जारी करने का भी ऐलान किया। इस घोषणापत्र में मुंबई के विकास, पारदर्शिता, स्थानीय नागरिकों के अधिकारों और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया गया है। ठाकरे बंधुओं ने दावा किया कि उनकी साझा रणनीति का मकसद मुंबई की राजनीति को फिर से जनता के हितों की ओर मोड़ना है।

चुनाव आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार बीएमसी की 227 सीटों पर मतदान होना है, जिसे लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। सत्ताधारी गठबंधन और विपक्ष के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा है। ऐसे में ठाकरे बंधुओं की एकजुटता और उनके द्वारा लगाए गए आरोपों ने चुनावी माहौल को और अधिक गर्मा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह साझा हुंकार न केवल चुनावी समीकरण बदल सकती है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर बहस को भी और तेज कर सकती है।

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