नई दिल्ली: नए साल 2026 में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से आम जनता और अर्थव्यवस्था को राहत मिलने की उम्मीद है। दिसंबर 2025 में RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की कटौती कर इसे 5.25% कर दिया था। यह कदम आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और बाजार में तरलता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। ब्याज दर में कमी से बैंकों की उधार लागत घट सकती है, जिससे होम लोन, कार लोन और अन्य ऋण उत्पादों पर EMI का बोझ कम होगा। इस निर्णय के बाद शेयर बाजार में भी तेजी देखी गई, जिसमें सेंसेक्स 300 अंक तक उछला और निफ्टी 26,100 के पार गया।
विशेषज्ञों और ब्रोकरेज हाउसों का मानना है कि यदि मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहती है और आर्थिक वृद्धि का ट्रेंड मजबूत रहता है, तो RBI 2026 में और भी कटौती कर सकती है, जिससे रेपो रेट 5% तक पहुँच सकता है। वर्तमान में मुद्रास्फीति अनुमान लगभग 2% पर स्थिर है, जबकि GDP ग्रोथ का अनुमान 7.3% तक बढ़ाया गया है। इसे केंद्रीय बैंक ने एक संतुलित या “Goldilocks” अवधि बताया है, जो आगे नीतिगत राहत की संभावनाओं को मजबूत करती है।
हालांकि ब्याज दरों में कटौती की गई है, RBI रुपये की स्थिरता और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी कड़ी निगरानी रखेगी। दरों में कमी से बैंकिंग और क्रेडिट सिस्टम को तरलता मिलने की संभावना है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों और रुपये की मजबूती को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय बैंक नियंत्रण बनाए रखेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक संकेतकों और मुद्रास्फीति के रुझानों के आधार पर RBI 2026 में रेपो रेट को 5% तक ला सकती है, हालांकि अगर मुद्रास्फीति बढ़ती है या वैश्विक परिस्थितियाँ अस्थिर होती हैं, तो दरों को स्थिर भी रखा जा सकता है।
नए साल की शुरुआत में यह नीति आम जनता, व्यापार और निवेशकों के लिए राहत का संकेत देती है। ब्याज दरों में कमी से कर्ज की लागत घटेगी, आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और निवेशकों तथा गृह खरीदारों को लाभ होगा। फिर भी RBI रुपये की मजबूती और मुद्रास्फीति पर कड़ी निगरानी बनाए रखेगी ताकि आर्थिक संतुलन प्रभावित न हो।













