FTA बना सियासी मुद्दा, न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री ने समझौते को बताया असंतुलित

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भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच लंबे समय से चली आ रही बातचीत के बाद मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर सहमति बनी है। दोनों देशों की सरकारों का कहना है कि यह समझौता द्विपक्षीय आर्थिक रिश्तों को नई मजबूती देगा और आने वाले पांच वर्षों में आपसी व्यापार को लगभग दोगुना करने में मदद करेगा। समझौते के तहत वस्तुओं, सेवाओं और निवेश के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे दोनों देशों के व्यवसायों को नए बाजार और अवसर मिल सकेंगे।

इस एफटीए के अनुसार न्यूज़ीलैंड के करीब 95 प्रतिशत निर्यात पर भारत में आयात शुल्क को चरणबद्ध तरीके से घटाया या समाप्त किया जाएगा। इनमें से कई उत्पाद ऐसे होंगे जिन्हें समझौते के लागू होते ही शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलेगा। वहीं भारत को भी न्यूज़ीलैंड के बाजार में अपने औद्योगिक उत्पादों, सेवाओं और आईटी सेक्टर के लिए बेहतर पहुंच मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में बड़े पैमाने पर निवेश करने की प्रतिबद्धता भी जताई है, जिससे रोजगार सृजन और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

हालांकि इस समझौते पर न्यूज़ीलैंड के भीतर ही विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। देश के विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने एफटीए को “न तो मुक्त और न ही निष्पक्ष” बताते हुए इसे न्यूजीलैंड के हितों के खिलाफ करार दिया है। उनका कहना है कि इस समझौते में न्यूजीलैंड ने भारत को आव्रजन और श्रम बाजार से जुड़ी कई रियायतें दी हैं, लेकिन बदले में उसे अपने सबसे अहम क्षेत्र—डेयरी उद्योग—के लिए पर्याप्त लाभ नहीं मिला।

न्यूज़ीलैंड की अर्थव्यवस्था में डेयरी उत्पादों का बड़ा योगदान है, लेकिन भारत ने अपने घरेलू किसानों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दूध, पनीर, मक्खन और अन्य डेयरी उत्पादों पर ऊंचे शुल्क बरकरार रखे हैं। विदेश मंत्री पीटर्स का तर्क है कि यदि इन उत्पादों को भारतीय बाजार में वास्तविक पहुंच नहीं मिलती, तो इस समझौते को संतुलित नहीं कहा जा सकता। उनकी पार्टी ने संकेत दिए हैं कि वह संसद में इस एफटीए का विरोध कर सकती है।

भारत सरकार ने इन आपत्तियों पर साफ किया है कि देश के कृषि और डेयरी क्षेत्र करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़े हैं, इसलिए इन्हें किसी भी व्यापार समझौते में पूरी तरह खोलना संभव नहीं है। भारत का कहना है कि एफटीए का उद्देश्य केवल व्यापार बढ़ाना नहीं, बल्कि संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करते हुए दीर्घकालिक आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार यह समझौता भारतीय निर्यातकों, एमएसएमई सेक्टर और सेवा उद्योग के लिए नए अवसर पैदा करेगा।

कुल मिलाकर भारत-न्यूज़ीलैंड एफटीए को दोनों देशों के रिश्तों में एक अहम कदम माना जा रहा है, लेकिन न्यूजीलैंड के भीतर राजनीतिक असहमति के चलते इस पर आगे की राह आसान नहीं दिखती। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि संसद और घरेलू दबावों के बीच यह समझौौता किस रूप में लागू होता है और क्या दोनों देश आपसी मतभेदों को सुलझाकर इसे संतुलित बना पाते हैं या नहीं।

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