वंदे मातरम् पर बोले नेता, भड़की राजनीति—कांग्रेस का दावा: ‘सरकार की मंशा संदिग्ध’

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संसद के शीतकालीन सत्र में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में शुरू हुई विशेष चर्चा ने राजनीतिक माहौल को अचानक गर्म कर दिया। तीन दिनों तक चली इस बहस ने राष्ट्रगीत के इतिहास, उसके महत्व और राजनीतिक उपयोग पर तीखे मतभेदों को सामने ला दिया। प्रधानमंत्री के भाषण के बाद विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया। सरकार ने इस चर्चा को राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ते हुए इसे भारतीय पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक बताया, जबकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष इस मुद्दे का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए कर रहा है। कांग्रेस का कहना है कि बहस के दौरान केंद्र सरकार ने कई ऐतिहासिक तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया और अपने दावों का समर्थन करने के लिए उपयुक्त प्रमाण पेश नहीं कर सकी। पार्टी नेता जयराम रमेश ने कहा कि संसद में हुए विमर्श ने प्रधानमंत्री और उनकी टीम को “बेनकाब” कर दिया है और यह दिखा दिया है कि सरकार की दलीलें इतिहास पर नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडे पर आधारित हैं।

विपक्षी नेताओं का यह भी कहना है कि वंदे मातरम् जैसे राष्ट्रभावना से जुड़े गीत को किसी राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं है। कुछ सांसदों ने बहस के दौरान यह प्रश्न उठाया कि क्या किसी गीत को राष्ट्रीय पहचान का अनिवार्य पैमाना बनाया जाना देश की बहुलता और संवैधानिक आज़ादी के खिलाफ नहीं जाता। उधर, भाजपा ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के प्रति “द्वैध रवैया” अपनाने और इतिहास को अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने का आरोप लगाया। दोनों ओर से दिए गए बयानों ने सामाजिक और राजनीतिक बहस को और तीखा बना दिया।

बहस के दौरान वंदे मातरम् के छंदों, उनके ऐतिहासिक संदर्भ, और संविधान सभा में हुई पुरानी चर्चाओं का मुद्दा भी उठा। कुछ सदस्यों ने यह तर्क दिया कि गीत के मूल स्वरूप और उसकी भावना को बिना संशोधन के सम्मान मिलना चाहिए, जबकि अन्य नेताओं का कहना था कि सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक भावनाओं के मद्देनज़र इसे किसी पर थोपना उचित नहीं होगा। इस विवाद का असर सोशल मीडिया और जन-चर्चा में भी स्पष्ट रूप से नजर आया, जहाँ बहस समर्थक और विरोधी दोनों पक्षों में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली।

समग्र रूप से, वंदे मातरम् पर हुई यह संसदीय चर्चा केवल एक गीत के 150वें वर्ष का औपचारिक स्मरण नहीं रही, बल्कि उसने देश की राजनीति, इतिहास की व्याख्या और चुनावी रणनीतियों को केंद्र में ला दिया। जिस मुद्दे को सरकार राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बता रही है, वहीं विपक्ष इसे इतिहास के पुनर्लेखन और भावनात्मक राजनीति का प्रयास बता रहा है। यह साफ है कि आने वाले दिनों में भी यह विषय राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा।

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