सुप्रीम कोर्ट का आदेश: CJP प्रदर्शनकारियों में आपराधिक रिकॉर्ड न रखने वालों और नाबालिगों की तुरंत रिहाई, पुलिस को अनुचित कार्रवाई से रोका

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों (Cockroach Janta Party यानी CJP से जुड़े) से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत की अगुवाई वाली पीठ ने सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि प्रदर्शन में शामिल उन छात्रों को तुरंत रिहा किया जाए जिनकी आयु 18 वर्ष से कम है और जिनके खिलाफ कोई आपराधिक पृष्ठभूमि (criminal antecedents) नहीं है।

अदालत ने साफ कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई जबरदस्ती (coercive) कार्रवाई नहीं की जाए। हालांकि यह सुरक्षा उन लोगों को नहीं मिलेगी जिनके आपराधिक रिकॉर्ड हैं या जिन्हें अदालत ने एंटी-सोशल एलिमेंट्स माना है। FIR दर्ज होने के बाद जांच जारी रह सकती है, लेकिन छात्रों पर अनावश्यक दबाव या उत्पीड़न नहीं होना चाहिए।

आदेश के मुख्य बिंदु

  • नाबालिगों और साफ रिकॉर्ड वालों की रिहाई: सभी राज्यों को निर्देश कि 18 साल से कम उम्र के हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों और जिनके कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं हैं, उन्हें तुरंत छोड़ दिया जाए।
  • कोर्सिव एक्शन पर रोक: दिल्ली और अन्य राज्यों को कहा गया कि मौजूदा FIR की जांच तो हो सकती है, लेकिन बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले छात्रों के खिलाफ कोई जबरदस्ती कदम न उठाए जाएं।
  • सबूत सुरक्षित रखें: इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सबूत (CCTV फुटेज आदि) को सुरक्षित रखने का निर्देश।
  • निष्पक्ष जांच: प्रदर्शनकारियों और पुलिस दोनों तरफ हुई चोटों की निष्पक्ष और संतुलित जांच हो।
  • डेटा सुरक्षा: प्रदर्शनकारियों के निजी डेटा को सार्वजनिक न किया जाए।

यह आदेश जंतर मंतर और देश के अन्य जगहों पर पेपर लीक (खासकर NEET संबंधी मुद्दों) के खिलाफ CJP के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों से जुड़े याचिकाओं पर आया है। प्रदर्शनों के दौरान हिंसा के आरोप लगे थे, जिसमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों को चोटें आई थीं।

CJP ने इस आदेश पर असंतोष जताया है। संगठन का कहना है कि यह केंद्र सरकार द्वारा 25 जुलाई 2026 को दिए गए आश्वासन के विपरीत है, जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सभी FIR वापस लेने की बात कही गई थी। CJP प्रवक्ता सौरव दास ने चेतावनी दी है कि अगर आश्वासन का पालन नहीं हुआ तो प्रदर्शन फिर शुरू किए जा सकते हैं।

अदालत ने प्रदर्शन के अधिकार को मान्यता देते हुए भी यह स्पष्ट किया कि कानून व्यवस्था बनाए रखना और हिंसा फैलाने वालों पर कार्रवाई जरूरी है।

Leave a Comment

और पढ़ें