नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक मामलों में एक चिंताजनक नई प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी पक्ष द्वारा ससुराल वालों (इन-लॉज) पर गंभीर रेप और यौन उत्पीड़न (molestation) के आरोप लगाकर भारी आर्थिक समझौते (hefty settlements) हासिल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जस्टिस गिरिश कठपालिया की एकल पीठ ने इसे 498A/406 IPC के दुरुपयोग से जोड़ा, जिसके बाद अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद गिरफ्तारी में सख्ती आई है।
मुख्य टिप्पणियां
जस्टिस गिरिश कठपालिया ने टिप्पणी की:
“मैं वरिष्ठ वकील की दलील में सच्चाई पाता हूं कि हाल के दिनों में, सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार फैसले के बाद, जहां 498A/406 के तहत गिरफ्तारी पर अंकुश लगा है, शिकायतकर्ता अब रेप, मोलेस्टेशन और अन्य गंभीर यौन दुर्व्यवहार के आरोप लगाने लगे हैं, ताकि ससुराल वाले भारी राशि देकर मामला सुलझा लें।”
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता शुरू में ऐसे गंभीर आरोप नहीं लगाती, लेकिन बाद में (जैसे 164 CrPC बयान में) इन्हें जोड़ देती है, खासकर जब पति तलाक की याचिका दायर कर दे।
मामले का संक्षिप्त विवरण (Vikram Kumar Jha vs State)
FIR संख्या: PS Sangam Vihar में 498A, 406, 376, 354A, 506, 509, 34 IPC आदि के तहत।
आरोपी: पति के भाई (भाभी के देवर)।
विवाद: शादी के बाद वैवाहिक कलह, पति ने तलाक दायर किया।
आरोप: शुरुआती FIR में रेप नहीं था, बाद में जोड़ा गया — कोर्ट ने इसे संदिग्ध माना।
कोर्ट का आदेश: ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक (stay) लगाई, राज्य को स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा, और अगली सुनवाई तक मामले को रोका।
व्यापक संदर्भ
यह फैसला 498A IPC के दुरुपयोग पर दिल्ली हाईकोर्ट की कई पिछली टिप्पणियों के अनुरूप है। कोर्ट अक्सर कह चुका है कि यह कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए था, लेकिन अब पति और परिवार को परेशान करने का हथियार बन गया है। हालांकि, कोर्ट हमेशा स्पष्ट करता है कि वास्तविक क्रूरता के मामले में कार्रवाई होनी चाहिए।
यह फैसला उन जोड़ों के लिए महत्वपूर्ण है जहां वैवाहिक विवाद आर्थिक दबाव या बदले की भावना से कानूनी लड़ाई में बदल जाते हैं।











